By: Rahul Kumar (Jamia Millia Islamia), PhD Scholar- IR
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ विचारों की विविधता, असहमत का अधकार और राजनीतक भागीदारी लोकतांत्रक जीविन के महत्विपूर्ण मूल्य हैं। यहाँ समय-समय पर अनेक विैचारक समूह, संगठन और आंदोलन उभरते रहे हैं, जन्होंने भ्रष्टाचार, प्रशासनक कमयों अथविा सरकार की विभन्न नीतयों के विरुद्ध अपनी आविाज़ उठाई है। राजनीतक विचारक “हन्ना आरेंट” का मानना था क लोकतंत्र में ‘असहमत’ लोकतांत्रक जीविन का आविश्यक तत्वि होता है। लोकतंत्र की यही विशेषता है क नागरकों को अपनी बात रखने और शासन से जविाबदेही की अपेक्षा करने का अधकार देता है। डिजटल युग में यह प्रक्रिया और भी तीव्र हो गई है। सोशल
मीडिया, मीम संस्कृत और ऑनलाइन समुदाय राजनीतक अभव्यत के नए माध्यम बनकर उभरे हैं। आज कोई भी विचार, अभयान या आंदोलन कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है और व्यापक जनचचार्ण का विषय बन जाता है।
भारतीय सभ्यता में राज्य केविल एक राजनीतक इकाई नहीं, बल्क सांस्कृतक चेतना का प्रतीक रहा है। भारतीय परंपरा कसी भी विषय को एकांगी नहीं, बल्क समग्र दृष्ट से देखने की प्रेरा देती है। उपनषदों का संदेश “सत्यम् विद, धमर्णम् चर” सत्य और धमर्णसम्मत आचर के महत्वि को रेखांकत करता है। विहीं ऋग्विेद का मंत्र “संगच्छध्विं, संविदध्विं” समाज में एकता, संविाद और सामूहक उत्तरदायत्वि की भाविना को मजबूत करता है। आज भारत विश्व के सबसे युविा देशों में से एक है। इसलए युविाओं की अपेक्षाएँ भी स्विाभाविक रूप से
अधक हैं। आज भारत के युविा विगर्ण, शक्षा, रोजगार और भविष्य को लेकर डिजटल माध्यमों के जरये भी अपनी आविाज़ प्रभाविी ढंग से उठा रहा है तथा राष्ट्र नमार्ण की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमका नभा रहा है। राजनीतक विैज्ञानक “मैनुअल कास्टेल्स” ने अपनी पुस्तक “Networks of Outrage and Hope” में लखा है क डिजटल नेटविकर्ण आधुनक आंदोलनों की नई शत बन चुके हैं। सोशल मीडिया अब केविल सूचना का माध्यम नहीं, बल्क राजनीतक लामबंदी और जनमत नमार्ण का एक महत्विपूर्ण उपकर बन गया है।
इसी परप्रेक्ष्य में कॉकरोच जनता पाटर्टी (CJP), जसका शादक अथर्ण “तलचट्टा जनता पाटर्टी” है, एक व्यंग्यात्मक डिजटल राजनीतक अभयान के रूप में अभजीत दीपके तथा उनके सहयोगयों विजेता दहया, आशुतोष रनका और सौरभ दास के द्वारा मई 2026 में सविर्वोच्च न्यायालय में हुई एक सुनविाई के दौरान की गई टप्पी से उठाया है, जसने राष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया का व्यापक ध्यान अपनी ओर आकषत कया। कुछ ही समय में यह अभयान सोशल मीडिया पर व्यापक चचार्ण का विषय बन गया और बड़ी
संख्या में युविाओं का ध्यान आकषत करने लगा। 6 जून 2026 को कॉकरोच जनता पाटर्टी के नेतृत्वि में दल्ली के जंतर-मंतर पर एक प्रदशर्णन भी आयोजत कया गया। प्रदशर्णन का मुख्य मुद्दा NEET परीक्षा से संबंधत विविाद, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे प्रश्न थे। प्रदशर्णनकारयों ने शक्षा व्यविस्था में सुधार तथा जविाबदेही की मांग करते हुए तत्कालीन शक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठाई।
आंदोलन से जुड़े लोगों ने यह भी कहा क यद उनकी मांगों पर प्रभाविी कारर्णविाई नहीं की गई, तो भविष्य में विभन्न राज्यों में भी इसी प्रकार के प्रदशर्णन आयोजत कए जाएंगे।
लोकतांत्रक व्यविस्था में युविाओं और विद्याथयों की विास्तविक समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करना सरकार का दायत्वि होता है। कतु कसी भी आंदोलन की सफलता में उसकी विैचारक दशा और उसकी भाषा महत्विपूर्ण होती है। प्रदशर्णन के दौरान
कुछ ऐसे नारे और विैचारक टप्पयाँ सामने आईं, जो हमारे देश की विविधता एविम् राष्ट्र प्रभुता को चुनौती देने जैसा था। इसलए यह आंदोलन अपने विास्तविक मुद्दों से हटकर मथक से ज्यादा प्रेरत दखाई दया। आधुनक राजनीत केविल नीतयों की राजनीत नहीं रह गई है, बल्क यह नैरेटवि की राजनीत भी बन चुकी है। कसी भी आंदोलन की सफलता अब केविल उसके मुद्दों पर नभर्णर नहीं करती,
बल्क इस बात पर भी नभर्णर करती है क विह आम जन के सामने अपनी बात कस प्रकार प्रस्तुत करता है। 21विीं सदी में संघषर्ण केविल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते। सूचना, विचार, मीडिया और जनमत भी शत के महत्विपूर्ण साधन बन चुके हैं। इसी कार अनेक राजनीतक विश्लेषक इसे “नैरेटवि विॉरफेयर” या “सूचनात्मक संघषर्ण” की संज्ञा देते हैं।
इतहास बताता है क कई बड़े राजनीतक परवितर्णन प्रारंभ में छोटे समूहों और सीमत आंदोलनों से ही शुरू हुए थे। फ्रांसीसी क्रिांत की शुरुआत कुछ बुद्धजीवियों और असंतुष्ट विगर्गों से हुई, जसने बाद में पूरे यूरोप की राजनीत को प्रभावित कया। रूसी क्रिांत ने एक विशाल साम्राज्य का अंत कर दया। अरब स्प्रिग ने सोशल मीडिया की शत के माध्यम से अनेक देशों में राजनीतक परवितर्णन की प्रक्रिया को प्रभावित कया। और वितर्णमान में हमने श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में भी इस प्रकार का विरोध प्रदशर्णन देखा है। शुरुआत में छोटे दखाई देने विाले विरोध प्रदशर्णन भी समय के साथ व्यापक सामाजक और राजनीतक प्रभावि उत्पन्न कर सकते हैं। भारत में भी पूविर्ण में जयप्रकाश नाराय आंदोलन और अन्ना हज़ारे आंदोलन प्रारंभ में सीमत दायरे के अभयान थे, कतु बाद में उन्होंने पूरे राष्ट्रीय राजनीत को प्रभावित कया।
भारत की सभ्यता हजारों विषर्गों से विभन्न विचारधाराओं, आक्रिमों, आंदोलनों और राजनीतक परवितर्णनों से गुजरते हुए आज भी जीवित है। इसका कार केविल राज्य की शत नहीं, बल्क भारतीय समाज की सांस्कृतक दृढ़ता और आध्यात्मक चेतना है। प्रसद्ध सामाजक चतक “Dr. Keshav Baliram Hedgewar” का मानना था क कसी भी राष्ट्र की विास्तविक शत उसके संगठत और जागरूक समाज में नहत होती है। उनके अनुसार समाज जतना अधक संगठत, अनुशासत और राष्ट्रहत के प्रत समपत होगा, विह राजनीतक, आथक और विैश्वक चुनौतयों का उतनी ही दृढ़ता से सामना कर सकेगा। इसी दृष्ट से राज्य का दायत्वि है क विह युविाओं, विद्याथयों और नागरकों की विास्तविक समस्याओं का समयबद्ध समाधान करे, ताक समाज में विश्वास, समरसता और सहभागता की भाविना मजबूत हो। एक स्विस्थ लोकतंत्र विही है जसमें सरकार और समाज दोनों अपने-अपने दायत्विों का नविर्णहन करते हुए राष्ट्र नमार्ण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएँ। डिजटल युग में छोटे आंदोलन भी बड़े सामाजक और राजनीतक परवितर्णन का आधार बन
सकते हैं। आचायर्ण चाय के शदों में “प्रजा के विश्वास में ही राज्य की शत नहत होती है।” इसलए कसी भी आंदोलन को उसके नारों से नहीं, बल्क उसके उद्देश्यों, प्रभाविों और राष्ट्रहत में योगदान के आधार पर परखा जाना चाहए।
जय हिद, वंदे मिातरमि् ।

