नर्मदा जयंती 2025: नर्मदा के तट से…

Blog Editorial

नर्मदा बस एक नदी है यह कहकर हम कितनी आसानी से निकल जाते है, नर्मदा को समझे बिना , उसके मूल तत्व को समझे बिना कुछ भी कहना बेइमानी है, मैं अभी भी नहीं समझ पर रहा हूं, कि क्यों इतने लोग इस नदी के पीछे पड़े है, क्यों इतने लोग इसके तटों पर चल रहे हैं, क्यों इसके कोने- कोने में शिव मंदिर है, क्यों इतने आश्रम है । हर एक शिव मंदिर की एक अलग कहानी है और उन शिव मंदिरों की कहानियों में एक बात समान है, कि शिव जी ने यहां आकर वर दिया ।

हजारों ऋषि,मुनि, सुर, असुर,नाग,गंधर्व सब अपने इष्टों की आराधना कर रहे है, और नर्मदा इनकी तपस्या में सहायता कर रही है; दृश्य है परन्तु अदृश्य होकर। मैं भी समझना चाहता हूं उस अदृश्य नर्मदा को, उस आत्मानुभूति को, उस सत्य को, उस चिदानंद को, जो सनातन काल से इसकी लहरों में कल – कल ध्वनि के गीत गा रहा है, जो विंध्य- सतपुड़ा के ऊंचे ऊंचे पेड़ो के पत्तों से स्पर्श करती हुई वायु के नादों को, लोकों में उठाई जा रही उस तान को, जो हर बार इसी सत्य उद्भाषित करती है, कि नर्मदा तुम बहती रहो| न केवल इस पृथ्वी में, बल्कि लोगों के मन में, उनकी प्रज्ञा में, भावों में, विचारों में, कर्मों में और उनकी सेवा में ।

तुम स्थायित्व लेकर प्राकृतिकता में रमी रहो, बसी रहो लोक में, ताकि लोक का धार्मिक संस्कार न छूटे, तुम डटी रहो साधु – संतों के अडिग संकल्पों में, और तुम रमी रहो ‘ शिव ‘ में, ताकि बना रहे कंकर कंकर शंकर के जैसा, नर्मदा ! तुम बहती रहो।

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